विरासत और उत्तराधिकार: अपनी संपत्ति की सुरक्षा करें
भारत में उत्तराधिकार कानून धर्म के अनुसार भिन्न होते हैं। वसीयत बनाना और उसे पंजीकृत कराना संपत्ति विवादों से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है।
मुख्य बातें
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 संशोधन के बाद बेटियों को भी सहदायिकी में बराबर का अधिकार मिला। पंजीकृत वसीयत कानूनी विवादों से बचाती है। नामांकन (Nomination) और वसीयत दोनों करें — नामांकन केवल ट्रस्टी का काम करता है। भारत में वर्तमान में कोई विरासत कर नहीं है।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 (2005 में संशोधित) हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों पर लागू होता है। 2005 के संशोधन ने बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार दिया।
बिना वसीयत के मृत्यु होने पर संपत्ति वर्ग-I उत्तराधिकारियों (पत्नी, बच्चे, माता) में बराबर बंटती है। स्व-अर्जित संपत्ति पर व्यक्ति का पूर्ण अधिकार होता है और वह वसीयत द्वारा किसी को भी दे सकता है।
वसीयत का पंजीकरण
वसीयत (Will) एक कानूनी दस्तावेज़ है जो बताता है कि मृत्यु के बाद संपत्ति कैसे बांटी जाएगी। भारत में वसीयत का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है लेकिन पंजीकृत वसीयत को अदालत में चुनौती देना कठिन होता है।
वसीयत बनाने के लिए दो गवाहों की आवश्यकता होती है। उप-पंजीयक (Sub-Registrar) कार्यालय में पंजीकरण कराया जा सकता है। वसीयत को कभी भी बदला जा सकता है — नवीनतम वसीयत ही मान्य होती है।
नामांकन और संपत्ति हस्तांतरण
बैंक खातों, बीमा पॉलिसियों, म्यूचुअल फंड और PPF में नामांकन (Nominee) करें। लेकिन ध्यान रखें कि नामांकित व्यक्ति केवल ट्रस्टी होता है — कानूनी उत्तराधिकारी नहीं।
संपत्ति हस्तांतरण के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र या प्रोबेट की आवश्यकता हो सकती है। भारत में वर्तमान में कोई विरासत कर (Inheritance Tax) नहीं है, लेकिन प्राप्त संपत्ति की बिक्री पर पूंजीगत लाभ कर लागू होता है।
उत्तराधिकार कानून जटिल हैं और धर्म के अनुसार भिन्न होते हैं। कृपया कानूनी सलाहकार से परामर्श लें। यह सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं।